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योग शब्द संस्कृत के युज धातु से बना है जिसका अर्थ है जुड़ जाना। हमारा ये जुड़ाव कई तल पे हो सकता है। योग ने जीवन के आयाम को कई तलों में देखा, जाना और महसूस किया। इन सभी तलों को समझते हुए ही हमारे प्राचीन योगियों ने पंच मन , पंच प्राण, पंच शरीर, पंच कर्मेन्द्रिया, पंच ज्ञानेन्द्रियां , पंच तन्मात्राएं , पंच महाभूत और ना जाने कितने और सूक्ष्म स्थूल तल। हर तल का एक दूसरे के साथ एकाकार और संगति होनी जरुरी है- नहीं तो हम अस्वस्थ हो जाएंगे। स्वास्थ्य का कुल मतलब है हमारे हर तलों में एक संगति और अस्वस्थ का मतलब तलों में बिखराब
  योग आसन भी हमारे कई तलों को ऐसे ही जोड़ता है। जो लोग आसनों को शरीर की क्रिया भर समझते हैं , दरअसल उन्होंने ना योग को जाना और ना ही जिया है। आसन अपने आप में ध्यान की परम ऊंचाई हो सकती है- तभी तो पतंजलि योगसूत्र में आसन को स्थिरं सुखमं के रुप में दर्शाया है जो ध्यान की अवस्था है। आसनों की ये स्थिरता लगातार अभ्यास मांगती है और सहयोग के साथ आसनों का ये योग और  आनंदित करता है। कभी कभी आप भी आसनों के बेहतर नींव पड़ने के बाद इन तस्वीरों की तरह सहयोग का योग हासिल करें- तस्वीर में मौजूद साधक – योगगुरु धीरज, योगी राजीव जी और योगी नीरज जी का आभार
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योगगुरु धीरज जी के साथ पाएं योग की गहराई,  योग में जॉब-केरियर का एक अवसर खुद में करें पैदा ,क्लिक करें 

IMG_6797 IMG_6825 IMG_6814 IMG_6804 नमस्ते ऊँ 
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