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हर कोई हर दिन मन की बक-बक से परेशान हैं। मन तुम्हें हर वक्त दूर और बहुत दूर ले जाता है। मन जितना मजबूत होगा, तुम खुद को उतना कमजोर पाओगे, खुद से खुद को दूर पाएंगे। जितना तुम्हारे पास मन है उतने ही तुम अपने से दूर हो । मन के पास कोई रिवर्स गियर नहीं, वह तो बस बाहर ही जाता है। मनोवैज्ञानिकों ने ठीक ही कहा है कि मनुस्य कुछ नहीं बस एक भीड़ है- मन के विचारों की भीड़। हम एक नहीं, हमारे अंदर प्याज की तरह परत-दर-परत हैं। मन की एक परत को उघारो तो कई और परत दिख जाएंगें। तुम बस मन के विचारों की एक भीड़ हो। मन का ये कोलाहल तुम्हें शांत नहीं होने देता। मन की ये बौखलाहट तुम्हें एक जगह टिकने नहीं देती। मन घड़ी के पेंनडुल्म की तरह तुम्हें एक एक्स्ट्रीम से दूसरे एक्स्ट्रीम की तरफ दौड़ाएं लिए जाता है। तुम कहीं टिकते नहीं, ठहरते नहीं। बस अंधी दौड़ में तुम फंसे चले जाते हो    

मन की वृत्तियां है तुम्हारा संसार  

महर्षि पतंजलि अपने योगसूत्र में इशारा करते हैं कि मनुस्य मन की वृत्तियों के जरिए खुद के वास्तिवक स्वरुप को जान नहीं पाता। ये ठीक उसी तरह का है जैसे ठहरे पानी में कंकड़ मारने से उसमें उत्पन्न लहरें हमारे वास्तिवक चेहरे को सामने नहीं रखती। लहरे एकबार शांत हो जाएं तो हम अपने वास्तिवक रुप को पानी में देख पाते हैं। पतंजलि कहते हैं मन को कंट्रोल करके ही हम अपने वास्तिवक स्वरुप को देख पाएंगे। हमारे भाषाविद् बहुत होशियार रहें, इसलिए उन्होनें हमें मनुष्य या मानव कहा-दोनों शब्द मन से बना है, यानि ऐसा जीव जिसमें मन पैदा हो गया। मन की वृत्तियों का कंट्रोल ही योग है   

पढ़ें- योग है परम होश    

कैसे हो मन का निरोध ?   

अर्जुन जब दुविधा में फंस गएं तो श्रीकृष्ण ने मन को निरोध करना ही रास्ता बताया। ऐसे में अर्जुन कहता है कि- हे मधुसूदन, ये मन बहुत ही चंचल स्वभाव वाला है और इसको वश में करना वायु को वश में करने जैसा दुस्कर है। फिर श्रीकृष्ण कहते हैं कि अभ्यास और वैराग्य से मन का निरोध किया जा सकता है। श्रीकृष्ण यहां बस इशारा कर रहें हैं, सूत्र बता रहें हैं, लेकिन इस सूत्र का संधान तभी होगा जब हम मन को समझें और मन को समझें बिना उसे काबू में करना बहुत मुश्किल है। वशिष्ठ योग के योगगुरु धीरज वशिष्ठ यहां बता रहें हैं कि क्या है मन की बुनाबट , आखिर क्यों ज़रुरी है मन का कंट्रोल कैसे सरल तरीक़े से मन हो काबू ?  
 
नमस्ते 
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