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प्रधानमंत्री मोदी जी की कोशिश से आज पूरी दुनिया 21जून को वर्ल्ड योग डे मना रही है। योग साधक होने के नाते योग को आगे बढ़ता देख खुशी होती है । साथ ही ये हमारा दायित्व है कि योग के लिए हम कुछ बेहतर करें, क्योंकि योग सीधे हमारी ज़िंदगी से जुड़ा है, ऐसे में योग बढ़ेगा तो हम बढ़ेंगे।  दुख इस बात पे होती है कि कहीं ये योग दिवस भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की तरह देश के लिए खानापूर्ति बनकर ना रह जाए। 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन फेसबुक, वाट्सअप्प पे जैसे देशभक्ति अंदर कुलांचे मारने लगती है, देशभक्ति की गीतों से हर दिल भावुक होता दिखता है, लेकिन उसके बाद वाली तस्वीर से हम सभी वाकिफ हैं। ठीक ऐसा कुछ योग दिवस के साथ होता दिख रहा है, जो इस देश के लिए दुर्भाग्य है जहां योग की संस्कृति पुष्पित-पल्लवित हुई और उसकी डालियां पूरी दुनिया में आज साधना के फूलों से लदी दिख रही है।
अहमदाबाद में ‘रिकॉर्ड का बाबा रामदेव योग’ 
बाबा रामदेव ने कहा है कि वो 21 जून को अहमदाबाद में 5 लाख लोगों के साथ योग कर विश्व रिकॉर्ड बनाएंगे। इसके लिए उनके लाखों कार्यकर्ता घर-घर जा रहे हैं, प्रभात फेरियां निकाल रहें हैं, सोशल मीडिया पे एक्टिव हैं। गुजरात सरकार इस कार्यक्रम में उनके साथ है तो वाजिब तौर पे पूरी सरकारी मशीनरी लगी हुई है, सरकारी दफ्तरों और कॉलेजों को कार्यक्रम में भारी संख्या में मौजूद होने का निर्देश दिया जा रहा है। सवाल है कि इस बड़े आयोजन से क्या सचमुच योग और आम आदमी का भला होने जा रहा है ? ऐसा तो नहीं कि ये महज भीड़ जुटाने, रिकॉर्ड बनाने की फौरी कवायद बनकर रह गई है ?  भारत जैसे देश में जहां जनसंख्या एक विस्फोट के रुप में है, वहां बड़े शख्सियतों के लिए भीड़ जुटा कर रिकॉर्ड बना पाना आसान है, लेकिन इस भीड़ को योग दिवस के बाद भी योग या खुद से जोड़े रख पाना काफी कठिन है। आख़िर कब तक किसी भी कार्यक्रम की सफलता-असफलता का निर्णायक भीड़ होती रहेगी ? योग की शुरुआत गुफा और जंगलों में प्रैक्टिस करने वाले से हुई, लेकिन आज वो पूरी दुनिया की धड़कनों में बस गया हो तो उसकी वजह भीड़ नहीं बल्कि योग की अपनी खूबियां और जीवन देने की उसकी संजीवनी शक्ति में है।
अंगद रुपी कदम उठाने से होगा घर-घर में योग 
योग कोई एक्सरसाइज़ सिस्टम नहीं है। एकात्म मानवतावाद के दर्शन के साथ योग श्रेष्ठ जीवनशैली की वकालत करता है। बेहोशी के इस वातावरण में योग परमहोश है। योग वर्तमान में जीने की वो कला है, जिससे हम अपने जीवन को उत्सव की तरह जी पाएं। योग दिवस की शुरुआत योग की इन्ही खूबियों को घर-घर पहुंचाने के संकल्प के साथ हुआ है। अगर हम सही मायने में योग के साधक हैं और वास्तिवक अर्थों में योग को जन-जन का धन बनाना चाहते हैं, तो कुछ ज्यादा मूल्यवान अंगद रुपी क़दम उठाने होंगे। बाबा रामदेव ने योग को काफी प्रसारित-प्रचारित किया है, लेकिन उनके जैसा योगी जब भीड़ जुटाने को योग की सफलता मान लेंगे तो कई सवाल उठने लाजिमी हैं। 
  • क्या इतनी भारी भीड़ को सही-सही योग का अभ्यास सिखाया या करवाया जा सकता है ? एक योग शिक्षक होने के नाते मेरा अनुभव कहता है कि योग बहुत साइंटिफिक और आर्टिस्टक साधना है और बारीकियों का ख़्याल इतनी भारी भीड़ में नहीं रखी जा सकती। प्राचीन वक्त से योग हर व्यक्ति की क्षमता और उसकी ज़रुरतों को ध्यान में रख सिखाया या अपनाया जाता रहा है। क्या 5 लाख की भीड़ में योग टीचिंग के इस सिद्धांत को बचाया रखा जाएगा ? क्योंकि थोड़ी से भी चूक लाभ देने की जगह लोगों को थोड़ा या ज़्यादा नुक़सान दे सकती है। क्या वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के चक्कर में हम इसको नज़रअंदाज़ कर सकते हैं ? 
  • वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में सरकार और दूसरे संस्थाओं का जो करोड़ों रुपया खर्च हो रहा है, उन पैसों को अगर छोटे निष्ठावान योग संस्थाओं या शिक्षकों को सहयोग दिया जाता तो वो साल भर योग के कार्यक्रम को बेहतर तरीके से नहीं चलाते ? वशिष्ठ योग जैसी कितनी संस्थाएँ बेहतर काम कर रही है और ज्यादा काम करना चाहती है, लेकिन संसाधन की कमी में मक़सद को पंख नहीं लग पाते। क्या भीड़ जुटाने और महंगे आडंबर की जगह ऐसी संस्थाओं की पतंजलि योग मदद नहीं कर सकती ? आख़िरी साल इंडिया गेट पे कैलाश खेर को गाने पे बुलाया गया और इसके लिए उन्हें मोटी रक़म दी गई, क्या इस तरह के गाने से योग का भला होगा ? 
  • 5 लाख के रिकॉर्ड आयोजन के प्रचार के लिए प्रभात फेरियों और घर-घर जाने की जगह बाबा के कार्यकर्ता अगर योग सीखाने में वक्त लगा रहे होते तो क्या इससे योग की सेवा और ज्यादा नहीं होती ? 
  • दूसरे गरीब गांवों और शहरों की तुलना में अहमदाबाद अमीर तबकों से भरा शहर है। यहां काफी संख्या में योग शिक्षक और संस्था मौजूद है, लोगों के पास योग के लिए पैसे भी हैं। अगर सही मायने में योग दिवस में कुछ योग-अलख जगाना ही मक़सद है तो ग्रामीण भारत या थोड़े कम समृद्ध शहरों में इस तरह के आयोजन का ख़्याल बाबा रामदेव जी को क्यों नहीं आया ? 
  • योग दिवस में विश्व रिकॉर्ड बनाने की चाहत में सरकारी संस्थाओं के लोगों, कॉलेजों के बच्चों को जबर्दस्ती मौजूद रहने का आंतरिक निर्देश दें,  क्या सचमुच हम  योग को उनके दिलों-दिमाम में उतार पाएंगे या ये मजबूरी उनको और ज्यादा योग से दूर करेगा ? साइकोलॉजी के हिसाब से आप जब जबर्दस्ती चीजों को थोपते हैं तो उसके ख़िलाफ़ ही हमारा मन रिएक्ट करता है। हमें योग के तरह आकर्षण पैदा करने के ज़्यादा भरोसेमंद नुस्खों पे काम करने की ज़रुरत है। याद रहें दूसरे मॉस रॉक इवेन्ट की तरह हम योग को जन-मानस में परोस नहीं सकते। योग का नेचर उन सार्वजनिक मैराथन आयोजन से अलग है जहां भीड़ बस दौड़ पड़ती है, या जहां लोग डीजे के धुन में थिरकने के लिए उमड़ पड़ते हैं। 
  • योग दिवस को महज भीड़ का आयोजन बनाने की जगह सरकारें या पतंजलि जैसी संस्थाएं, योग की गुणवत्ता बरकरार रखने में क्यों नहीं इस धन और ताक़त को छोंक रही है ? क्या ये सच्चाई नहीं है कि भारत में आज योग करने वालों की संख्या ज़्यादा है, लेकिन दुनिया की तुलना में आम लोगों की प्रैक्टिस और टीचिंग की गुणवत्ता बदतर हो रही है, क्यो नहीं इस सुधार के लिए योग संकल्प लिया जा रहा है ? योग टीचिंग के पीछे के दर्शन को आख़िर हम क्यों झुठला रहें हैं ? 
योग आयोजन में  ऋषि कम, राजनीतिज्ञ ज्यादा 
यौगिक लाइफ स्टाइल को बढ़ावे देने की उद्देश्य से आयोजित होने वाला ये योग दिवस हमारी कुछ गलतियों की वजह से राजनीति का भी भुक्त-भोगी बन रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी जी की कोशिशों से आज पूरा देश वर्ल्ड योग डे मना रहा है। मोदी जी के सामने आने से योग को लेकर लोगों का उत्साह भी बढ़ा है, लेकिन सच्चाई ये भी है कि योग में राजीनितक क्रियाशीलता से बेवजह योग को लेकर नई और गैरज़रुरी बहसे शुरु हो गई। सूर्यनमस्कार का एक ख़ास समुदाय के जरिए विरोध इसी का एक रुप है,जबकि मुझे अहमदाबाद के खानपुर से कई मुस्लिम परिवारों ने ख़ासतौर पे सूर्यनमस्कार सीखने के लिए बुलाया है। सवाल है कि आख़िर क्यों बिहार की नीतीश सरकार , दिल्ली की केजरीवाल सरकार योग दिवस से तौबा कर रही है ? ऐसा नहीं कि नीतीश जी या केजरीवाल जी को योग से परहेज है, बल्कि वो खुद योग के अभ्यासी हैं। दरअसल जब भी हम लोक कल्याणकारी कदम में राजनीति का जूता डाल देते हैं, तब वो कदम लड़खड़ाता हुआ मिलता है। अमेरिका जहां योग अरबों-खरबों रुपए का कारोबार है वहां हमने कभी अमेरिकी राष्ट्रपति या दूसरे नेताओं को योग मंच पे आते नहीं देखा। तीन साल पूरे कर चुके पीएम मोदी का लखनऊ में और गुजरात चुनाव से ठीक पहले बाबा रामदेव जी एवं अमित शाह जी का अहमदाबाद में योग दिवस आयोजन के पीछे क्या राजीनितक मायने नहीं हैं ? क्या योग की भलाई में हमारे प्यारे राजनेता इस मंच का त्याग नहीं कर सकते ? क्यों नही इस मंच पे हम देश भर के प्रतिष्ठित योग संस्थाओं को ज्यादा से ज्यादा सामने लाएं और उनसे पूछे या सलाह लें कि आख़िर कैसे योग जन-जन की धड़कन बन सके ? आख़िर योग के हर मौक़े पे बाबा रामदेव ही क्यों सरकारी कार्यक्रमों में नज़र आते हैं ? बिहार स्कूल ऑफ योग, कृष्णम आचार्य योग संस्थान, आयंगर योग , मैसूर अष्टांग योग जैसी कई संस्थाओं को योग दिवस पे क्यों नहीं याद किया जा रहा,जिनके योगियों ने पूरे विश्व में योग का डंका बचाने में भगीरथ प्रयास किएं हैं ?  राजऋषि से योगऋषि की उपाधि पाएं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रभाई मोदी जी से देशवासायों को ज़्यादा चौड़ी छाती की उम्मीद है और एक साधक होने के नाते उनसे अपील है कि वो योग हित मे दधीचि त्याग कर जन-मानस में प्ररेणा पैदा करें। 
योग समर्थक, व्यक्ति या राजनीति विरोधी नहीं 
मेरे इस लेख के बाद हो सकता है कि कुछ लोग मुझे खास पार्टी या व्यक्ति का विरोधी बताने की होड़ में लग जाएं। मैं यहां किसी का विरोध करने नहीं आया, मैं बस योग का समर्थक हूं। योग ने मुझे बहुत कुछ दिया है, जो कोई छीन ना पाएं। इस योग जीवन तरंग को लोगों तक आध्यात्मिक तरीक़े से पहुंचाना मेरा मक़सद है, मेरी संस्था वशिष्ठ योग, छोटे तल पे ही सही, लेकिन यौगिक जीवन को आगे बढ़ाने में लगी है। मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि कहीं योग दिवस महज एक फौरी कवायद ना बन के रह जाएं। योग दिवस के नाम पे पैसे और शक्ति की बर्बादी ना होने पाएं। राजीनीति की छाया में जन-जन का योग कहीं दलगत राजनीति की कीचड़ में ना लिपट जाए। हमारे पूवर्जों की दी गई महान विरासत है योग। सामाजिक-राजीनीतिक-धार्मिक सभी लोग योग के हित में हो, क्योंकि योग हमारे हित में है और अनजाने योग का अहित ना हो उसका ख्याल रहें, क्योंकि वो उस प्राण का अहित होगा जो योगरुप में पूरी दुनिया के रगों में स्पंदन कर रहा है। आज देश में एक ऐसा व्यक्ति पीएम है जो योग अभ्यासी है। मुझे उम्मीद है कि वो मेरी योग को लेकर संवेदना और चिंता को समझ पाएंगे और योग को आगे ले जाने के लिए सचमुच योगऋषि बन इसकी रक्षा करेंगे
योग दिवस पे ख़ास तैयार किया गया इस वीडियो को देखें- 21 आसन करने का सही तरीक़ा 
   

लेखक धीरज वशिष्ठ, योगगुरु और वशिष्ठ योग फॉण्डेशन चैरिटेबल संस्था के संस्थापक हैं 

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  1. May 24, 2017

    I agree with you Guruji

  2. May 24, 2017

    I am agreed with Mr. Vashistha Yoga. The govt is getting some hidden benefits from the Patanjali group. Govt should promote small NGO and other charitable organisations on World Yoga Day.
    Need to rationalise the efforts whatever taken by the central government.

  3. May 24, 2017

    agreed…Bcoz yog is not for any record or not for exhibition. Yog is a thing to apply in the life.

    नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
    न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌॥

    न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
    ॥66॥

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