Durga kavach
श्रीदुर्गा सप्तशती में वर्णित दुर्गा-कवच साइकोलॉजिकल हीलिंग ( मनोवैज्ञानिक चिकित्सा ) का सबसे बड़ा सूत्र है। योग इसे भावना चिकित्सा के रुप में लेता है। योग मानता है कि जो कुछ भी आप दिलो-जान से महसूस करते हैं वो आप होने लगते हैं। हमारे ऋषियों के “अमृतस्य पुत्रा वयं यानी हम अमृत की संतान हैं” – कहने के पीछे यही सोच थी। दुर्गाकवच ऐसी ही भावना चिकित्सा है। एक-एक अंग और शरीर की कार्यप्रणाली की रक्षा मां भगवती कर रही है – ऐसा पुण्य भाव अनुभूति है दुर्गाकवच। सिर्फ शब्दों की तरह इन्हें पढ़ लेंगे तो कुछ भी घटित नहीं होने वाला, महज कर्मकांड रह जाएगा। दुर्गा कवच में वर्णित श्लोकों को अपने भाव में गहरे उतारना है, ध्यानस्थ हो जाना है, फिर इसमें कोई संशय नहीं कि स्वयं जगत जननी मां दुर्गा हमारे सारे दुर्गणों व दुर्गमता का नाश कर हमें सुरक्षा कवच से सज्जित रखेंगी । अब दुर्गा कवच श्लोक व भावार्थ सहित :-
ॐ नमश्चण्डिकायै ॥
मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्य चिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥
मार्कण्डेय जी ने कहा हे पितामह ! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताएं
ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्रा सर्वभूतोपकारकम्।
दिव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्वा महामुने॥2॥
ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करनेवाला है। महामुने! उसे श्रवण करो
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥3॥
प्रथम नाम शैलपुत्री है, दूसरी ब्रह्मचारिणी हैं। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नाम से प्रसिद्ध हैं। चौथी कूष्माण्डा कहलाती हैं
 
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च 
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥4॥ 
पाँचवीं स्कन्दमाता हैं। देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है
नवमं सिद्धिदात्री च नव दुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥ 
नवीं का नाम सिद्धिदात्री है। ये सब नवदुर्गा नाम सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं। 
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥6॥
जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई अमङ्गल नहीं होता
न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसङ्कटे। 
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न ही॥7॥
युद्ध समय संकट में पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखाई देती। उनके शोक, दु:ख और भय की प्राप्ति नहीं होती 
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। 
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥8॥ 
जिन्होंने भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम नि:सन्देह रक्षा करती हो 
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना। 
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥
चामुण्डादेवी प्रेत पर आरूढ़ होती हैं। वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं। ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरुड़ पर ही आसन जमाती हैं 
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मी: पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥
माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होती हैं। कौमारी का मयूर है। भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मीदेवी कमल के आसन पर विराजमान हैं,और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं 
श्वेतरूपधारा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥ 11॥
वृषभ पर आरूढ़ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं 
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढया नानारत्नोपशोभिता:॥ 12॥
इस प्रकार ये सभी माताएँ सब प्रकार की योग शक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं 
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्याः क्रोधसमाकुला:।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥13॥ 
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च। कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥ 14॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च। धारयन्त्यायुद्धानीथं देवानां च हिताय वै॥ 15॥
ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिए रथ पर बैठी दिखाई देती हैं। ये शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त आयुध, त्रिशूल एवं उत्तम शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथ में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना,भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है 
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे। 
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥
महान रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान् बल और महान् उत्साह वाली देवी तुम महान् भय का नाश करने वाली हो, तुम्हें नमस्कार है 
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्रि आग्नेय्यामग्निदेवता॥ 17॥ 
दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खङ्गधारिणी। प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥ 18॥
तुम्हारी और देखना भी कठिन है। शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली जगदम्बिका मेरी रक्षा करें। पूर्व दिशा में ऐन्द्री इन्द्रशक्ति मेरी रक्षा करें। अग्निकोण में अग्निशक्ति,दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्यकोण में खड्गधारिणी मेरी रक्षा करें। पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्यकोण में मृग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करें
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी। ऊर्ध्वं ब्रह्माणी में रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥ 19॥ 
उत्तर दिशा में कौमारी और ईशानकोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करें। ब्रह्माणि ! तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करें  
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना जया मे चाग्रतः पातु: विजया पातु पृष्ठतः॥ 20॥ 
इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनानेवाली चामुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करें। जया आगे से और विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करें
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता। 
शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥21॥ 
वामभाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करें। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करें। उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करें।
मालाधारी ललाटे च भ्रुवो रक्षेद् यशस्विनी 
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥ 22॥
ललाट में मालाधरी रक्षा करें और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करें। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करें।
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी 
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शङ्करी ॥ 23॥ 
ललाट में मालाधरी रक्षा करें और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करें। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करें
नासिकायां सुगन्‍धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥ 24॥ 
नासिका में सुगन्धा और ऊपर के ओंठ में चर्चिका देवी रक्षा करें। नीचे के ओंठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती रक्षा करें
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका। 
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥ 25॥ 
कौमारी दाँतों की और चण्डिका कण्ठप्रदेश की रक्षा करें। चित्रघण्टा गले की घाँटी और महामाया तालु में रहकर रक्षा करें
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्‍ वाचं मे सर्वमङ्गला 
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धारी॥ 26॥ 
कामाक्षी ठोढी की और सर्वमङ्गला मेरी वाणी की रक्षा करें। भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश (मेरुदण्ड)में रहकर रक्षा करें
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी 
स्कन्धयोः खङ्गिनी रक्षेद्‍ बाहू मे वज्रधारिणी॥27॥
कण्ठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी रक्षा कंरे। दोनों कंधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करें
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चान्गुलीषु च। 
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥ 
दोनों हाथों में दण्डिनी और उँगलियों में अम्बिका रक्षा करें। शूलेश्वरी नखों की रक्षा करें। कुलेश्वरी कुक्षि- पेट में रहकर रक्षा करें
स्तनौ रक्षेन्‍महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥ 29॥
महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशिनी देवी मन की रक्षा करें। ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी उदर में रहकर रक्षा करें
नाभौ च कामिनी रक्षेद्‍ गुह्यं गुह्येश्वरी तथा। पूतना कामिका मेढ्रं गुडे महिषवाहिनी॥30॥ 
कट्यां भगवतीं रक्षेज्जानूनी विन्ध्यवासिनी। जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥ 
नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करें। पूतना और कामिका लिङ्ग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें। भगवती कटि भाग में और विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करें। सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबला देवी दोनों पिण्डलियों की रक्षा करें। 
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी। 
पादाङ्गुलीषु श्रीरक्षेत्पादाध:स्तलवासिनी॥32॥ 
नारसिंही दोनों घुट्ठियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठभाग की रक्षा करें। श्रीदेवी पैरों की उँगलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करें। 
नखान् दंष्ट्रा कराली च केशांशचैवोर्ध्वकेशिनी। 
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33॥
अपनी दाढों के कारण भयंकर दिखायी देनेवाली दंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊर्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करें। रोमावलियों के छिद्रों में कौबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करें। 
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती। अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥ 34 ॥ 
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा। ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु॥35 ॥ 
पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, माँस, हड्डी और मेद की रक्षा करें। आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करें। मूलाधार आदि कमल-कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूड़ामणि देवी स्थित होकर रक्षा करें। नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करें। जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्या देवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करें
शुक्रं ब्रह्माणी मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥ 
ब्रह्माणी ! आप मेरे वीर्य की रक्षा करें। छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार,मन और बुद्धि की रक्षा करें। 
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्। 
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥ 
हाथ में वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करें। कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याण शोभना मेरे प्राण की रक्षा करें
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी। 
सत्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥
रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करें तथा सत्त्वगुण,रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करें
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥
वाराही आयु की रक्षा करें। वैष्णवी धर्म की रक्षा करें तथा चक्रिणी चक्र धारण करने वाली देवी यश,कीर्ति,लक्ष्मी,धन तथा विद्या की रक्षा करें
गोत्रमिनद्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके। 
पुत्रान रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥40॥
इन्द्राणि! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें। चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करें। महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करें और भैरवी पत्नी की रक्षा करें
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा। 
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥ 41॥
मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करें। राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करें तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करें
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु। 
तत्सर्वं रक्ष मे देवी जयन्ती पापनाशिनी॥ 42॥ 
देवी! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, रक्षा से रहित है,वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो;क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो 
  पदमेकं न गच्छेतु यदिच्छेच्छुभमात्मनः। कवचेनावृतो नित्यं यात्र यत्रैव गच्छति॥ 43 ॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सर्वकामिकः।
 
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्। 
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥44॥ 
यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाए। कवच का पाठ करके ही यात्रा करें। कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है,वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह जिस-जिस अभीष्ट वस्तु का चिन्तन करता है, उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलना रहित महान ऐश्वर्य का भागी होता है 
निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रमेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥45॥
कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोकों में पूजनीय होता है 
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्। य: पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥46॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः। जीवेद् वर्षशतं साग्रामपमृत्युविवर्जितः॥47॥
देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है,उसे दैवी कला प्राप्त होती है। तथा वह तीनों लोकों में कहीं भी पराजित नहीं होता। इतना ही नहीं, वह अपमृत्यु रहित हो, सौ से भी अधिक वर्षों तक जीवित रहता है
  ( नोट- यहां पर कुछ श्लोक को एडिटिंग कर हटाया गया है , जिसकी आज के परिवेश में आवश्यकता नहीं जान पड़ी )  
यशसा वद्धते सोऽपी कीर्तिमण्डितभूतले। जपेत्सप्तशतीं चणण्डीं कृत्वा तु कवचं पूरा॥ 54॥ 
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्। तावत्तिष्ठति मेदिनयां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी॥54॥ 
कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश से साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है। जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डी का पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा बनी रहती है 
देहान्ते परमं स्थानं यात्सुरैरपि दुर्लभम्। 
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥55॥ 
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥ॐ॥ ॥ 56॥ 
देह का अन्त होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से नित्य परमपद को प्राप्त होता है, जो देवतोओं के लिए भी दुर्लभ है। वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याण शिव के साथ आनन्द का भागी होता है।

पढ़ें – आखिर कैसे दुर्गा कवच करता है साइकोलॉजिकल हीलिंग -मनोवैज्ञानिक चिकित्सा ?  

।। इति देव्या: कवचं सम्पूर्णम् ।
जय मां भवानी 
मां दुर्गा की कृपा सब ओर हो , शेयर करें 
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. . . . Continued
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