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नवरात्र के मौके पर दुर्गा सप्तशती के पाठ का विशेष अध्यात्मिक महत्व है। दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों से पहले तीन प्रथम अंगों- कवच, अर्गला और कीलक स्तोत्र का भी पाठ किया जाता है। ‘कवच’ का अर्थ है- सुरक्षा घेरा। मार्कंडेय पुराण के इस दुर्गा कवच में कहा गया है कि इसके पाठ से सभी तरह के रोगों का नाश हो जाता है । शरीर हर तरह से दुर्गा माँ की आध्यात्मिक ऊर्जा के घेरे में सुरक्षित रहता है। नियमित दुर्गा कवच पाठ करने वाले लंबी उम्र पाकर सांसारिक और आध्यात्मिक लाभ हासिल करते हैं 
आखिर क्यों इतना महत्वपूर्ण है दुर्गा कवच का पाठ ? कैसे होता है हमारे तन-मन पर दुर्गा कवच का शक्तिशाली असर ? दरअसल दुर्गा कवच का पाठ हमारे अंदर साइकॉलॉजिकल तरीके से असर करता है। प्राचीन भारतीय थेरेपी मानती रही है कि अगर मानसिक रूप से हम पॉजिटिव बातें कई बार दोहराएं तो एक निश्चित अंतराल के बाद मस्तिष्क उन बातों को स्वीकार कर लेता है। फिर शरीर के विभिन्न अंगों को मस्तिष्क के हिसाब के खुद को तैयार करना होता है। भगवान बुद्ध भी कहते रहें हैं कि ‘हम वहीं हैं जो हम सोचते हैं’।  कवच पाठ में हम अपने शरीर की बाहरी-आंतरिक अंगों की रक्षा और स्वस्थ रहने की बात करते हैं। कवच पाठ में एक-एक करके हम उन सभी अंगों का नाम श्रद्धा रखते हुए लेते हैं कि देवी दुर्गा उन अंगों को स्वस्थ रखते हुए हमें सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं। इस तरह की पॉजिटिव सोच को जब हम किसी भी ईश्वरीय शक्ति से जोड़ते हैं तो वे बातें हमारे मन में और भी ज्यादा मजबूती से जड़ें जमा लेती हैं। योग थेरेपी में भी साइकॉलॉजिकल विजुलाइजेशन की तकनीक अपनाई जाती है। इसे ‘भावना’ कहते हैं 
भावना एक साइकॉलॉजिकल हीलिंग तकनीक है। भावना थेरेपी मानती है कि जैसा भाव हम बनाते हैं, वैसा हमारा तन-मन हो जाता है। पिछले दिनों पश्चिम के मुल्कों में इस तरह के प्रयोग हुए जो भावना या दुर्गा कवच के पीछे की वैज्ञानिक अवधारणा को मजबूत करते हैं। वैज्ञानिकों ने इसे ‘प्लेसिबो इफेक्ट’ कहा है। रिसर्च में पाया गया कि व्यक्ति की पॉजिटिव सोच ज्यादा मामलों में हीलिंग या थेरेपी देती है। पॉजिटिव सोच तन-मन को बिल्कुल बदल डालता है। दुर्गा कवच महज एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आधार वाली साइकॉलॉजिकल हीलिंग तकनीक है। यह हमारे भीतर पॉजिटिव वेव्स को ऐक्टिव कर सेल्फ हीलिंग की प्रक्रिया को सपोर्ट करता है 
नवरात्र ही नहीं, हर दिन दुर्गा कवच के इस शक्तिशाली असर को गहराई में उतरने दें। इस व्यस्त दौर में यदि संपूर्ण दुर्गा सप्तशती पढ़ने का वक्त न मिले, संक्षिप्त कवच पाठ से भी काम चल सकता है। ख्याल रहे कवच पाठ को मैकेनिकल तरीके से न करें बल्कि जिन अंगों की सुरक्षा की बात पाठ में की गई है, वहां अपने मन को ले जाएं और भाव करें कि वह अंग विशेष सेहतमंद है। लगातार इस तरह की सोच से आपका तन-मन कुछ महीनों में और ज्यादा स्वस्थ और ऊर्जा से भरपूर हो जाएगा 
नमस्ते

लेखक- धीरज वशिष्ठ, योगगुरु और वशिष्ठ योग के संस्थापक हैं।  

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  1. September 27, 2017

    भारतीय सभ्यता ओर संस्कृति जो वसुधैव कुटुम्बकम की घोषणा एवं उसे चरितार्थ करता है, उसे आगे बढ़ाने का आपका प्रयास अनुकरणीय एवं सराहनीय है। आपके संस्था के प्रगति की मैं प्रार्थना करता हूँ। ॐ शिव।।

  2. September 27, 2017

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