Suryanadi Eccess
जीवन का ताना-बाना सूर्य और चंद्र नाड़ी के इर्द-गिर्द बसा पड़ा है । योग में अक्सर आप कुंडलिनी जागरण की बात सुनते हैं लेकिन आपने यह भी जाना होगा कि कुंडलिनी जागरण की बात जो हमारे ऋषि-मुनियो ने कही वह दो नाड़ियों का  संतुलन है। संतुलन मतलब होता है सूर्य (इडा) और चंद्र (पिंगला ) नाड़ी का संतुलन जिससे सुषुम्ना जागृत होती है । सुषुम्ना का जागरण ही कुंडलिनी जागरण है जिससे आप अपने आंतरिक शक्ति का सही-सही इस्तेमाल जान जाते हैं ।  
सूर्यनाड़ी बढ़ने की वजह क्या ? हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य-चंद्र के बैलेंस की खासियत को समझा इसलिए बहुत पहले से वकालत की लेकिन दुर्भाग्य से हमारे युग में भी इस तरह के एक्सरसाइज उछल कूद और वर्कआउट के सिस्टम को पश्चिमी सभ्यता से उधार लाकर हमारे अपने दर्शन में पिरो दिया गया है जैसे  तेज गति से सांस या प्राणायाम , जल्दी जल्दी आसन या सूर्यनमस्कार या आज जो हम एक्सरसाइज, फिटनेस, वर्कआउट और तमाम तरह की चीजें कर रहे हैं वह हमारे अंदर सूर्यनाड़ी को ही बड़ा रहा है । इसलिए बहुत जरूरी है कि अगर आप स्वास्थ्य को समझना चाहते हैं तो आपको सूर्य-चंद्रनाड़ी को संतुलित करना होगा 

आधुनिक साइंस का भी मानना है ?  आधुनिक साइंस ने भी माना है  कि ज्यादा सूर्यनाड़ी ( सिंपैथेटिक नर्वससिस्टम ) का ज्यादा एक्टिव होना मतलब ह्रदय रोग, हाई बीपी, नींद की समस्या, लीवर ,कीडनी,अपचन,डायबिटीज,पेट आंत जैसे रोग की वजह बन रही है।
कैसे साधे सूर्य व चंद्रनाड़ी में संतुलन ? इसकेलिए समझें स्वरयोग के सिद्धांत को, कुंडलिनी विज्ञान व स्वास्थ्य के सनातन योग रहस्य को, प्रकट कर रहें हैं वशिष्ठ योगाश्रम से योगगुरु धीरज जी  
 
 
नमस्ते ऊँ 
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