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पूरी मानवता के इतिहास में कृष्ण अकेले ऐसे व्यक्तित्व हैं जो सभी आयामों में खिले हुएं हैं। कहीं वो बांसुरी बजाने वाले कृष्ण हैं तो कहीं सुदर्शनधारी कृष्ण, कहीं गोपियों के साथ रास रचाने वाले कृष्ण हैं तो कहीं कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में भी गीता संदेश देने वाले कृष्ण। कृष्ण हर जगह अपनी पूर्णता में मौजूद हैं। आख़िर कैसे कमल की तरह खिला कृष्ण का व्यक्तित्व ? क्या हैं कृष्ण के होने के मायने ? कृष्ण जन्माष्टमी में सिर्फ कृष्ण की पूजा कर लेना आसान है, लेकिन कृष्ण होने की तैयारी कठिन। कृष्ण बनने की तैयारी, कृष्ण के मार्ग पे चलने की तैयारी है, ख़ुद से जुड़ने के मार्ग पे चलने की तैयारी- योग मार्ग की तैयारी।
आएं कृष्ण जन्माष्टमी पे जाने कृष्ण के मुख से कहे उनके सर्वश्रेष्ठ योग वचन:

1. हे श्रीकृष्ण ! योग क्या है ?

“आसक्ति को त्यागकर, जय-पराजय में समान हुआ व्यक्ति ही योग में स्थित है, क्योंकि समत्व ही योग कहलाता है. समत्व भाव से कर्म करने वाला व्यक्ति हर तरह से कुशल होता है और कर्मों की ये कुशलता ही योग है”।

2. हे केशव ! योगी कौन है और उसके लक्षण क्या हैं ?

बिना फल की चिंता किए कर्म करने वाला व्यक्ति योगी है। सिर्फ गृहस्थ जीवन का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है और केवल कर्मों का त्याग करने वाला योगी नहीं है। जिसको संन्यास कहते हैं, उसीको तू योग जान। जो अपने ही संकल्प से दूर भाग जाता है, वो योगी नहीं होता। सर्दी-गर्मी, सुख-दुख, मान-अपमान और जय-पराजय में शांत चित्तवृत्तियां-ऐसे योगी के लक्षण हैं। ऐसा योगी हितैषी, मित्र, शत्रु, धर्मात्मा और पापियों के लिए भी समान भाव रखने वाला होता है।

3. हे महाबाहु ! इस योग को कैसे प्राप्त किया जाता है ? 

             अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में कर योग को पाया जा सकता है। मन की एकाग्रता और अांतिरक शुद्धिता के लिए अभ्यास ही एकमात्र उपाय है। आसन, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास तुम्हें योगारुढ़ करेगा। काया, सिर और गले को समान और अचल-स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर या भृकुटी के मध्य में ध्यानमग्न व्यक्ति योग को, यानी मुझको प्राप्त करता है। पद-प्रतिष्ठा, धन-सम्मान, यश आदि के प्रति आसक्ति का त्याग वैराग्य है। 

4. हे माधव !  दुखों को नाश करने वाला ये योग किस व्यक्ति को सिद्ध होता है? 

यह योग न तो बहुत खानेवाले का, न बिलकुल खानेवाले का , न बहुत सोने वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है । दुखों का नाश करने वाला योग तो यथा योग्य आहार–विहार करने वाले का, कर्मों में यथा योग्य चेष्टा करनेवाले का और यथा योग्य सोने तथा जागनेवाले का ही सिद्ध होता है।

5. हे वासुदेव ! कुछ लोग शास्त्रों के अध्ययन पे जोर देते हैं, कुछ शरीर को कष्ट देने वाले तपों में लगे हैं, योग इनसे कैसे अलग है और इन सबमें कौन-सा मार्ग बेहतर है ? 

योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र के ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है, तथा सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिए तुम योगी हो। 
कृष्ण साफ-साफ कह रहें हैं कि शास्त्र के रटे हुए शब्द ज्ञान, तोते की तरह रटे शब्दों की तरह है, ऐसे में महज शास्त्र या धार्मिक पुस्तकों को शब्दसह रट लेने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। वहीं धर्म हो या आध्यात्मिक मार्ग सभी के लिए शरीर साधन की तरह हैं, ऐसे में तप के नाम पे शरीर को नाहक पीड़ा देना बेहतर नहीं। साथ ही कर्म से फल की चाहत हमेशा तनाव का कारण और शारीरिक-मानसिक समस्या बढ़ाने वाला है, इसलिए निष्काम कर्म अपनाने योग्य है। मन की सारी वृत्तियां ही सभी तरह के झंझटों की जड़ है। ऐसे में मन को नियंत्रित करने वाला योग ही श्रेष्ठ है।

पढ़े, योग है परम होश 

कृष्ण के योग संदेश साफ-साफ इशारा करते हैं कि चेतना की उच्चतम स्थिति है योग। योगाभ्यास मन को अमन की ओर ले जाने का रास्ता है। एक बार हम चैतन्य की ऊंचाई को छूते हैं तो मन का अंधेरा छंट जाता है, अपने वास्तविक स्वरुप से हम जुड़ पाते हैं। इस परम शांति की अवस्था में ना राग है, ना द्वेष ; ना मान, ना अपमान। बस एक साक्षी की तरह हम जिंदगी के आनंद में होते हैं, योग में होते हैं।
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