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हम हर बार अपनी मंजिल तय करते हैं। चल भी पड़ते हैं, लेकिन चलने की थकावट, चुनौती , रुकावटें कई बार हमें मंजिल से दूर ले चलती है या फिर कभी बीच में विश्राम का भाव हमारे अंदर घर कर जाती है। अनवरत लक्ष्य की ओर चलने वाला ही मंजिल का मालिक बनता है। कैसे पाए लगातार चलने की ये प्रेरणा , भीतर के उत्साह को आकाश तक छू लेने वाला ये प्रेरणा गीत योगगुरु धीरज जी के स्वर में
नमस्ते ऊँ 
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. . . . Continued
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