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भारतीय आध्यात्मिक चिंतन मानता है कि ‘यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे’ – यानी जो शरीर में है, वहीं विस्तार रुप में ब्रह्मांड में भी मौजूद है। दूसरे शब्दों में कहें तो जो ब्रह्मांड में है, वही पिण्ड यानी शरीर में भी मौजूद है। ब्रह्मांड में सूर्य हमारी ऊर्जा का केंद्र है, सूर्य नहीं तो हम भी नहींं, सूर्य से ही गति और जीवन मिलता है। योग दर्शन भी मानता रहा है कि हमारे अंदर भी सूर्य और चंद्र की मौजूदगी है, जिसे योग ने सूर्यनाड़ी और चंद्रनाड़ी के रुप में बताया। मौजूदा साइंस ने इसे ही सिम्फेथेटिक निर्वस सिस्टम (सन एनर्जी)  पारा सिम्फेथेटिक नर्वस सिस्टम (मून एनर्जी) के रुप में कहा। भाषा भले ही अलग हो सार वहीं है। इन दो तत्वों को समझते हुए अब हम उत्तरायण या मकर संक्रांति के अध्यात्मिक पहलू को समझने की कोशिश करते हैं 

उत्तरायण है अध्यात्मिक ऊंचाई की चाबी   

अध्यात्म की साधना में उत्तरायण का काफी महत्व बताया गया है। सूर्य का दक्षिण से उत्तर जाने की प्रक्रिया का प्रतीक है उत्तरायण। जैसा हमने समझा कि ब्रह्मांड की तरह हमारे अंदर भी सूर्य की मौजूदगी है , जो हमें जीवन ऊर्जा और दैनिक जीवन के लिए गति देती है। ऐसे में, ब्रह्मांड में हो रहा ये परिवर्तन हमारे आंतरिक जगत में भी परिवर्तन लाता है। योग मानता रहा है कि दक्षिणायन जहां शारीरिक शुद्धि के लिए है, वहीं उत्तरायण चैतन्यता को ऊंचाई देने यानी बुद्धत्व प्राप्ति का पहर है। भगवान बुद्ध को भी उत्तरायण के तीसरे पूनम के दर्म्यान ही निर्वाण यानी ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। महाभारत में भी बाणों की शय्या पे लेटे पितामह भीष्म प्राण त्यागने के लिए उत्तरायण के काल का इंतजार करते है। उत्तरायण रुपांतरण का काल है- ब्रह्मांड में हो रहा ये रुपांतरण हमारे अंदर के जगत को भी बदल डालता है। ऐसे में, प्राचीन काल से इस दिन को खासकर सूर्य आराधना या सूर्यनमस्कार की साधना का दिन बताया गया 

पतंग के साथ चैतन्यता को भी दें  ऊंची उड़ान  

पूरे देश में उत्तरायण के दिन अलग अलग तरह के कार्यक्रम होते हैं। कहीं कर्मकांड , कहीं गंगास्नान तो कहीं पतंग की उड़ान। ये सब अपने में अर्थ रखते हैं, लेकिन अध्यात्मिक चेतना को ऊंची उड़ान देने में कारगर नहीं हैं। प्राचीन परंपरा में उत्तरायण के दिन सूर्यनमस्कार के साथ योग की दूसरी साधना की जाती रही है। हमारे लिए भी बेहतर हो कि हम सुबह के कार्यक्रम की शुरुआत सूर्यनमस्कार साधना से करें और फिर दिनभर उत्तरायण से संबंधित दूसरे कार्यक्रमों जैसे कर्मकांड या पतंगबाजी में लगें । उत्तरायण के दिन किया जाने वाले सूर्यनमस्कार खास ब्रह्मांडीय परिवर्तन की वजह से बहुत असरदार माना जाता है। दूसरे दिन के मुकाबले आज के दिन किया जाने वाला सूर्यनमस्कार हमारे आयु, प्रज्ञा, बल और तेज़ में अभिवृद्धि करता है।

रिवरफ्रंड पे सूर्यनमस्कार साधना   

उत्तरायण के महत्ता के प्रति जागरण के लिए वशिष्ठ योग ने ‘सूर्यनमस्कार साधना’ का इसबार आयोजन रखा है। 14 जनवरी को साबरमती रिवरफ्रंड के इवेंट सेंटर पे एक भव्य सूर्यनमस्कार के कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। सूर्यनमस्कार को अपने आप में एक कम्प्लटी प्रैक्टिस के तौर पे लिया जाता रहा है। सूर्यनमस्कार के कई शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक लाभ है। सूर्यनमस्कार को इसतरह से डिज़ाइन किया गया है कि वो हमारे करीब 5 चक्रों पे असर डालते हैं। हमने देखा कि काफी लोग सूर्यनमस्कार करते हैं, लेकिन सही आसन और सही तरीका ना जानने की वजह से उन्हें पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता है। ऐसे में, वशिष्ठ योग ने 14 जनवरी को सूर्यनमस्कार साधना के तौर पे मनाने का निर्णय लिया। डेढ़ घंटे के इस सूर्यनमस्कार वर्कशॉप में पहले हम सभी 8 आसनों को सही तरीके से करना बताएंगे फिर उसे व्यवस्थित सीरीज़ एवं फ्लो में कैसे किया जाए इसको आपलोगों से साझा करेंगे। आखिर में 5 राउंड सूर्यनमस्कार सही तरीके से हम सभी एक साथ ग्रुप के रुप में अभ्यास में लाएंगे  
 
             नोट- तस्वीर में पूरी जानकारी दी गई है, इसे ध्यान से देखें। कार्यक्रम स्थल पे सुबह 6:40 में आएं और ठीक 7 बजे सुबह योगसाधना शिविर की शुरुआत हो जाएगी  

कार्यक्रम के गूगल लोकशन के लिए यहां क्लिक करें   

हैप्पी उत्तरायण 
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